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एक भारत श्रेष्ठ भारत : गुजरात की संस्कृति (भाग - 1)

 


गुजरात (अंग्रेज़ीGujaratपश्चिमी भारत में स्थित एक राज्य है। इसकी उत्तरी-पश्चिमी सीमा जो अन्तर्राष्ट्रीय सीमा भी हैपाकिस्तान से लगी है। प्राचीनता एवं ऐतिहासिकता की दृष्टि से गुजरातभारत का अत्यंत महत्त्वपूर्ण राज्य है। इसकी उत्तरी-पश्चिमी सीमा पाकिस्तान से लगी है। गुजरात का क्षेत्रफल 1,96,024 वर्ग किलोमीटर है।[1] यहाँ मिले पुरातात्विक अवशेषों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस राज्य में मानव सभ्यता का विकास हज़ार वर्ष पहले हो चुका था। कहा जाता है कि ई. पू. 2500 वर्ष पहले पंजाब से हड़प्पा वासियों ने कच्छ के रण पार कर नर्मदा की उपत्यका में मौजूदा गुजरात की नींव डाली थी। गुजरात ई.पू. तीसरी शताब्दी में मौर्य साम्राज्य में शामिल था। जूनागढ़ के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती है। पाँचवीं शताब्दी में हूणों के आक्रमण के बाद उत्तराखंड से गुर्जरों का इस क्षेत्र में आगमन हुआ। गुजरात पर चौथी-पाँचवीं शताब्दी के दौरान गुप्त वंश का शासन रहा। नौवीं शताब्दी में सोलंकी वंश का शासन रहा। 10 वीं शताब्दी में मूलराज सोलंकी ने आधुनिक गुजरात की स्थापना की। गुजरातवासी वाणिज्य व्यापार में कुशल होते है। विदेशों में बसे असंरथ गुजरातवासियों ने अपने व्यापार कौशल से अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में भी ख्याति अर्जित की है। महात्मा गाँधी का जन्म प्रदेश गुजरात द्रुत गति से औद्योगिक विकास कर रहा है।

नामकरण

गुजरात नामगुर्जरत्रा से आया है। गुर्जरों का साम्राज्य 6ठीं से 12वीं सदी तक गुर्जरत्रा या गुर्जर-भूमि के नाम से जाना जाता था। गुर्जर एक समुदाय है।प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जरों का सम्बन्ध सूर्यवंश या रघुवंश से बताया है। कुछ विद्वान् इन्हें मध्य-एशिया से आये आर्य भी बताते हैं। गुर्जरों की भूमि के रूप में गुजरात को जाना जाता है। इस प्रकार गूर्जरराष्ट्र से विकृत होते-होते उसका नामंतरण गुजरात के रूप में हुआ।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में गुजरात के अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने योगदान दिया है जिसमें से प्रमुख हैं- कस्तूरबा गाँधीमहात्मा गाँधीअश्विनी कुमार दत्तसरदार पटेलजीवराज मेहताहंसा मेहतागणेश वासुदेव मावलंकरविट्ठलदास झवेरभाई पटेलमहादेव देसाईमनीभाई देसाई आदि।

स्थापना

भारत के स्वतंत्र होने के समय यह प्रदेश मुम्बई राज्य का अंग था। अलग गुजरात का जन्म मई1960 को हुआ।


जनजीवन


गुजराती जनसंख्या में विविध जातीय समूह का मोटे तौर पर इंडिक / भारतोद्भव (उत्तरी मूल) या
 द्रविड़ (दक्षिणी मूल) के रूप में वर्गीकरण किया जा सकता है। पहले वर्ग में नगर ब्राह्मणभटियाभदेलाराबरी और मीणा जातियां (पारसीमूल रूप से फ़ारस सेपरवर्ती उत्तरी आगमन का प्रतिनिधित्व करते हैं)जबकि दक्षिणी मूल के लोगों में वाल्मीकिकोलीडबलानायकदा व मच्छि-खरवा जनजातिया हैं। शेष जनसंख्या में आदिवासी भील मिश्रित विशेषताएं दर्शाते हैं। अनुसूचित जनजाति और आदिवासी जनजाति के सदस्य प्रदेश की जनसंख्या का लगभग पाँचवां हिस्सा हैं। यहाँ डेंग ज़िला पूर्णत: आदिवासी युक्त ज़िला है। अहमदाबाद ज़िले में अनुसूचित जनजाति का अनुपात सर्वाधिक है। गुजरात में जनसंख्या का मुख्य संकेंद्रण अहमदाबादखेड़ावडोदरासूरत और वल्सर के मैदानी क्षेत्र में देखा जा सकता है। यह क्षेत्र कृषि के दृष्टिकोण से उर्वर है और अत्यधिक औद्योगीकृत है। जनसंख्या का एक अन्य संकेंद्रण मंगरोल से महुवा तक और राजकोट एवं जामनगर के आसपास के हिस्सों सहित सौराष्ट्र के दक्षिणी तटीय क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जनसंख्या का वितरण उत्तर (कच्छऔर पूर्वी पर्वतीय क्षेत्रों की ओर क्रमश कम होता जाता है। जनसंख्या का औसत घनत्व 258 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी (2001) है और दशकीय वृद्धि दर 2001 में 22.48 प्रतिशत पाई गई।


 
संस्कृति



गुजरात की अधिकांश लोक संस्कृति और लोकगीत हिन्दू धार्मिक साहित्य पुराण में वर्णित भगवान कृष्ण से जुड़ी किंवदंतियों से प्रतिबिंबित होती है। कृष्ण के सम्मान में किया जाने वाला रास नृत्य और रासलीला प्रसिद्ध लोकनृत्य "गरबाके रूप में अब भी प्रचलित है। यह नृत्य देवी दुर्गा के नवरात्र पर्व में किया जाता है। एक लोक नाट्य भवई भी अभी अस्तित्व में है।

गुजरात में शैववाद के साथ-साथ वैष्णववाद भी लंबे समय से फलता-फूलता रहा हैजिनसे भक्ति मत का उद्भव हुआ। प्रमुख संतोंकवियों और संगीतज्ञों में 15वीं सदी में पदों के रचयिता नरसी मेहताअपने महल को त्यागने वाली 16वीं सदी की राजपूत राजकुमारी  भजनों की रचनाकार मीराबाई, 18वीं सदी के कवि और लेखक प्रेमानंद और भक्ति मत को लोकप्रिय बनाने वाले गीतकार दयाराम शामिल हैं। भारत में अन्य जगहों की तुलना में अहिंसा और शाकाहार की विशिष्टता वाले जैन धर्म ने गुजरात में गहरी जड़े जमाई। ज़रथुस्त्र के अनुयायी पारसी 17वीं सदी के बाद किसी समय फ़ारस से भागकर सबसे पहले गुजरात के तट पर ही बसे थे। 

 इस समुदाय के अधिकांश लोग बाद में बंबई (वर्तमान मुंबईचले गए। कृष्णदयानन्द सरस्वतीमहात्मा गाँधीसरदार पटेल तथा सुप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी रणजी जैसे व्यक्तित्व ने प्रदेश के समाज को गौरवांवित किया। गुजरात की संस्कृति में मुख्यतशीशे का काम तथा 'गरबाएवं 'रासनृत्य पूरे भारत में प्रसिद्ध है। प्रदेश का सर्वप्रमुख लोक नृत्य गरबा तथा डांडिया है। गरबा नृत्य में स्त्रियाँ सिर पर छिद्रयुक्त पात्र लेकर नृत्य करती हैंजिस के भीतर दीप जलता है। डांडिया में अक्सर पुरुष भाग लेते हैं परंतु कभी-कभी स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर करते हैं। प्रदेश के रहन-सहन और पहनावे पर राजस्थान का काफ़ी प्रभाव देखा जा सकता है। प्रदेश का भवई लोकनाट्य काफ़ी लोकप्रिय है। स्थापत्य शिल्प की दृष्टि से प्रदेश काफ़ी समृद्ध है। इस दृष्टि से रुद्र महालयसिद्धपुरमातृमूर्ति पावागढ़शिल्पगौरव गलतेश्वरद्वारिकानाथ का मंदिरशत्रुंजय पालीताना के जैन मंदिरसीदी सैयद मस्जिद की जालियाँपाटन की काष्ठकला इत्यादि काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं। हिन्दी में जो स्थान सूरदास का है गुजराती में वही स्थान नरसी मेहता का है।

त्योहार और मेले

  • भारत के पश्चिमी भाग में बसा समृद्धशाली राज्य गुजरात अपने त्योहारों और सांस्कृतिक उत्सवों के लिये विश्व प्रसिद्ध है।
  • भाद्रपद्र (अगस्त-सितंबरमास के शुक्ल पक्ष में चतुर्थीपंचमी और षष्ठी के दिन तरणेतर गांव में भगवान शिव की स्तुति में तरणेतर मेला लगता है।
  • भगवान कृष्ण द्वारा रुक्मणी से विवाह के उपलक्ष्य में चैत्र (मार्च-अप्रैलके शुक्ल पक्ष की नवमी को पोरबंदर के पास माधवपुर में माधवराय मेला लगता है।
  • उत्तरी गुजरात के बांसकांठा ज़िले में हर वर्ष माँ अंबा को समर्पित अंबा जी मेला आयेजित किया जाता हैं।
  • राज्य का सबसे बड़ा वार्षिक मेला द्वारका और डाकोर में भगवान कृष्ण के जन्मदिवस जन्माष्टमी के अवसर पर बड़े हर्षोल्लास से आयोजित होता है।
  • इसके अतिरिक्त गुजरात में मकर संक्रातिनवरात्रडांगी दरबारशामला जी मेले तथा भावनाथ मेले का भी आयोजन किया जाता हैं।


मकर संक्रांति के पर्व पर मनाया जाने वाला पतंग उत्सव अपनी रंग-बिरंगी छवि के कारण गुजरात राज्य में अत्यंत लोकप्रिय है और भारत ही नहीं विदेशों में भी अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। जनवरी माह के मध्य में (14 जनवरीउत्तरायण पर्व आता है। भगवान भास्कर उत्तरायण को प्रयाण करते हैंबसंत ऋतु का आगमन होता हैकिसानों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता क्योंकि फसल पककर तैयार हो जाती हैकटाई का समय  जाता है। नव धान्य से बने सुस्वादु मिष्टान्न सभी को उत्सव का आनंद देते हैं। गुजरात में इस पर्व को मनाने का निराला रंग है। गुजरातवासी रंग-बिरंगी पतंगों से आसमान भर देते हैं। ये रंग विविधता में एकताआनंदउत्साह और परस्पर स्नेह-सौहार्द के प्रतीक हैं। पतंग पतले रंगीन काग़ज़  बाँस के रेशों से बनाई जाती है। पतंग की डोर माँझा कहलाती है जिसे फिरकी पर लपेटा जाता है। पतंग उड़ाने वाले पहले पतंग पसंद करते हैंवह ठीक बनी  संतुलित है या नहींफिर हवा की दिशा को देखते हुये कुशल हाथों से पतंग को ऊँची उड़ान देते हैं। कुशल उड़ाके आसमान में उड़ती पतंगों में से अपने प्रतिद्वंद्वी को पहचान लेते हैं और फिर शुरू होते हैं पतंग काटने के दाँव-पेंच। पतंग काटने वाले जीत का जश्न मनाते हैं। यह एक ऐसा रंगीन उत्सव है जहाँ बच्चे-बूढ़ेधनी-निर्धनस्वदेशी-विदेशी सभी भेद-भाव भूलकर अनंत आकाश में एकता के रंग भर देते हैं। गुजरात में राज्य पर्यटन विभाग की ओर से सन् 1989 से प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय पतंग उत्सव अहमदाबाद में आयोजित किया जाता है। बाहरी देशों के मेहमान विभिन्न प्रकार की पतंगें लेकर इस उत्सव में भाग लेते हैl


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